हिन्दी सिनेमा में गुरु दत्त एक ऐसे अदाकार और डायरेक्टर हुए हैं, जिन्हें बहुत कम ज़िंदगी मिली, लेकिन अपनी इस मुख़्तसर-सी ही ज़िंदगानी में वे फ़िल्मी दुनिया को इतना कुछ दे गये कि लोग उन्हें आज भी बड़ी शिद्दत से याद करते हैं। बहुत कम डायरेक्टरों को अवाम की यह मुहब्बत और चाहत हासिल होती है। गुरु दत्त का नाम हिन्दी सिनेमा के इतिहास में सुनहरे हुरूफ़ में दर्ज है। हिन्दी सिनेमा की जब भी ऑल टाइम क्लासिक फ़िल्मों की फे़हरिस्त बनती है, तो उसमें उनकी अमर फ़िल्म ‘प्यासा’ ज़रूर शामिल होती है।
साल 2005 में जानी-मानी मैगज़ीन ‘टाइम’ ने जब दुनिया की सर्वकालीन सौ महान फ़िल्मों की फ़ेहरिस्त बनाई, तो उसमें ‘प्यासा’ को भी रखा। गुरु दत्त को गुज़रे एक लंबा वक़्त बीत गया, लेकिन लोग उनकी फ़िल्मों और काम को भूले नहीं हैं। आज भी वे उनकी अदाकारी और डायरेक्शन स्टाइल के शैदाई हैं। साल 2025, इस जीनियस अदाकार का जन्मशती साल था और लोग उन्हें अलग-अलग तरह से याद करते रहे। और किया भी जाना चाहिए।
गुरु दत्त ने हिन्दी सिनेमा को जो दिया, वह कभी नहीं भुलाया जा सकता। नये फ़िल्मकारों को उनकी फ़िल्में हमेशा प्रेरणा देने का काम करती रहेंगी।
9 जुलाई, 1925 को बेंगलुरू के पास पन्नमबुर (कर्नाटक) में जन्मे गुरु दत्त ने अपनी ज़िंदगी के शुरुआती साल कलकत्ता में बिताए। सच बात तो यह है कि इसी शहर ने उन्हें सांस्कृतिक तौर पर संवारा। बंगाली जात्रा, बाउल गायकों और उदय शंकर के बैले डांस ने उन्हें बेहद प्रभावित किया। गुरु दत्त बचपन से ही होनहार थे। हिन्दी, अंग्रेज़ी, कोंकणी और बांग्ला वे बहुत अच्छी तरह से बोल लेते थे। किताबें पढ़ने का भी उन्हें ख़ूब शौक़ था। उनके मामा बीबी बेनेगल, वह शख़्स थे, जिन्होंने सबसे पहले गुरु दत्त की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें इस दिशा में प्रोत्साहित किया।
सत्रह साल की उम्र में गुरु दत्त कलकत्ता से दूरे अल्मोड़ा में उदय शंकर के ‘इंडिया कल्चरल सेंटर’ में नृत्य सीखने पहुँच गए। यहाँ वे 1942 से 1944 तक यानी दो साल रहे और काफ़ी कुछ सीखा। आर्थिक परेशानियों के चलते जब यह सेंटर बंद हुआ, तो बाक़ी कलाकारों की तरह गुरु दत्त भी वापस अपने घर लौट आए। उनके फ़िल्मी करियर की शुरुआत ‘प्रभात स्टुडियो’ (पुणे) से हुई। जहाँ उन्होंने पचास रुपए प्रति माह के वेतन पर नृत्य निर्देशक के तौर पर काम किया।
‘प्रभात फ़िल्मस्’ की फ़िल्मों में उन्होंने सहायक निर्देशक और कभी-कभी अदाकार के तौर पर भी काम किया। ‘प्रभात फ़िल्म कम्पनी’ की ‘हम एक हैं’ से गुरु दत्त की दोस्ती फ़िल्म के हीरो देव आनंद से हुई और यह दोस्ती इस अंजाम तक पहुँची कि देव आनंद ने जब अपनी फ़िल्म निर्माण कम्पनी बनाई, तो फ़िल्म ‘बाज़ी’ का निर्देशन गुरु दत्त को सौंपा और गुरु दत्त ने जब अपनी पहली फ़िल्म ‘सीआईडी’ प्रोड्यूस की, तो उसमें देव आनंद को हीरो के तौर पर लिया।
‘बाज़ी’ ही वह फ़िल्म थी जिससे देव आनंद को स्टारडम मिला। अदाकार के तौर पर ‘बाज़’ गुरु दत्त की पहली फ़िल्म थी, जो बॉक्स ऑफ़िस पर पूरी तरह नाकाम रही। लेकिन ‘आर-पार’ की कामयाबी के बाद फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। इस फ़िल्म की कामयाबी का राज़ अगर जानें, तो ओपी नैयर का मदहोशी जगाता संगीत और गीता दत्त की अदाकारी और शानदार गायकी थी।
बीसवीं सदी के पाँचवे दशक को भारतीय सिनेमा का स्वर्ण युग कहा जाता है। यही वह दशक है, जब राज कपूर की ‘आवारा’ और ‘श्री 420’, सत्यजित राय-‘पथेर पांचाली’, चेतन आनंद-‘टैक्सी ड्राइवर’, बिमल राॅय-‘दो बीघा ज़मीन’ और ‘देवदास’, महबूब ख़ान-‘मदर इंडिया’, बी.आर. चोपड़ा-‘नया दौर’, वी. शांताराम की ‘दो आँखें बारह हाथ’ जैसे फ़िल्में आईं। इन फ़िल्मों के डायरेक्टर और सारी स्टारकास्ट हीरो-हीरोइन, गीतकार-संगीतकार आदि ने देश में अपनी धूम मचा दी।
इसी दशक में गुरु दत्त ने एक के बाद एक ‘बाज़ी’ (1951), ‘जाल’ (1952), ‘आर-पार’ (1954), ‘मिस्टर एंड मिसेज 55’ (1955), ‘सी.आई.डी.’ (1956), ‘प्यासा’ (1957) और ‘काग़ज़ के फूल’ (1959) जैसी शानदार फ़िल्में बनाकर अपने निर्देशन का लोहा मनवा लिया। हिन्दी सिनेमा में इतने क़द्दावर डायरेक्टरों के बीच अपनी जगह बनाना, कोई आसान काम नहीं था। यह एक बड़ी उपलब्धि थी। जिसमें ‘बाज़ी’ और ‘सीआईडी’ को छोड़कर उन्होंने बाक़ी में अदाकारी भी की थी।
गुरु दत्त ने बहुत कम समय में वह सब हासिल कर लिया था, जिसके लिए लोग बरसों इंतज़ार और कड़ी मेहनत करते हैं। निर्माता-निर्देशक के तौर पर उन्होंने अपना ख़ुद का बैनर ‘गुरु दत्त फ़िल्मस प्राइवेट लिमिटेड’ बना लिया था। और उन्होंने अपनी एक टीम बनाई-जिसमें वहीदा रहमान जैसी प्रतिभाशाली हीरोइन, काॅमेडियन जाॅनी वाॅकर, कैमरामैन वीके मूर्ति, प्रोडक्शन कंट्रोलर गुरुस्वामी, स्क्रिप्ट राइटर-अबरार अल्वी उनकी टीम का अभिन्न हिस्सा थे।
यह बात बहुत कम लोगों को पता होगी कि गुरु दत्त की मशहूर-ओ-मारूफ़ फ़िल्म ‘प्यासा’ उनकी ख़ुद की कहानी ‘कशमकश’ पर केन्द्रित थी। और इस फ़िल्म के लिए उन्होंने दिलीप कुमार को मुख्य किरदार के लिए चुना था। लेकिन दिलीप साहब की क़िस्मत में इस फ़िल्म का हिस्सा होना नहीं लिखा था, बाद में यह किरदार ख़ुद गुरु दत्त ने निभाया। और उन्होंने क्या ख़ूब एक्टिंग की। गुरु दत्त की जब भी बेस्ट फ़िल्मों की बात होती है, तो ‘प्यासा’ का ज़रूर ज़िक्र होता है।
इस फ़िल्म में की गई उनकी अदाकारी की आज भी तारीफ़ होती है। फ़िल्म में उन्होंने अपने फ़िल्मी करियर का सबसे बेहतरीन काम किया है। गुरु दत्त ने अपनी अदाकारी से ‘विजय’ के किरदार को जैसे ज़िंदा ही कर दिया था। यह सामाजिक-रोमांटिक मेलोड्रामा दर्शकों को ख़ूब पसंद आया। ख़ास तौर पर साहिर लुधियानवी के गीतों ‘जिन्हें नाज़ है हिन्द पर वो कहाँ हैं’ और ‘ये दुनिया अगर मिल भी जाए, तो क्या है’ ने दर्शकों पर जादू-सा कर दिया।
‘प्यासा’ ने उस वक़्त देश के कई सिनेमाघरों में सिल्वर जुबली मनाई। और आज भी जब यह फ़िल्म किसी फ़िल्म फेस्टिवल में दिखाई जाती है, दर्शकों को बेहद पसंद आती है। ‘प्यासा’ के अलावा गुरु दत्त की एक और फ़िल्म ‘साहिब, बीवी और गुलाम’ (1963) को भी ख़ूब मक़बूलियत मिली। मीना कुमारी ने छोटी बहू, गुरु दत्त-भूतनाथ, वहीदा रहमान ने जवा के किरदार में अपनी लाजवाब अदाकारी से यह किरदार यादगार बना दिए।
गुरु दत्त के डायरेक्शन स्टाइल की बात करें, तो वे अपनी फ़िल्मों में क्लोज-अप शाॅट का काफ़ी इस्तेमाल करते थे। यह क्लोज-अप शाॅट ‘गुरु दत्त शाॅट’ कहलाते हैं। और इस ‘गुरु दत्त स्टाइल’ की आज भी नकल की जाती है। गुरु दत्त अपने काम में बेहद परफे़क्शनिस्ट थे, जब तक किसी सीन पर ख़ुद मुतमइन न हो जाते, लगातार टेक पर टेक लेते जाते। परफे़क्शन के लिए उनमें एक जुनून-सा था। यही नहीं शूटिंग के साथ ही उनकी स्क्रिप्ट और संवाद में आखि़र तक इम्प्रोवाइजेशन होता रहता था।
अपनी फ़िल्मों के गानों के फ़िल्मांकन पर भी वे काफ़ी मेहनत करते थे। जिसका असर पर्दे पर दिखाई देता था। गुरु दत्त ने अपने करियर की शुरुआत में रोमांटिक काॅमेडी और थ्रिलर फ़िल्में मसलन ‘बाज़ी’, ‘जाल’, ‘मिस्टर एंड मिसेज़ 55’, ‘आर-पार’ बनाईं, लेकिन आगे चलकर उनका झुकाव सामाजिक और उद्देश्यपूर्ण फ़िल्मों की ओर हुआ। जिनमें महिलाओं का सशक्त किरदार होता था। उनकी कामयाब फ़िल्मों ‘बाज़ी’, ‘आर-पार’, ‘सीआईडी’, ‘प्यासा’ और ‘काग़ज़ के फूल’ में ‘दूसरी औरत’ भी मौजूद है।
पर्दे पर यह प्रेम त्रिकोण दर्शकों के बीच आकर्षण पैदा करता था। गुरु दत्त ने अपनी फ़िल्मों में नये-नये प्रयोग किए। ख़ास तौर पर लाइट के इस्तेमाल और शैडो से वे कई सीनों में विशेष प्रभाव छोड़ते थे। ‘प्यासा’ की कामयाबी के बाद उनकी फ़िल्म ‘काग़ज़ के फूल’ देश की पहली सिनेमास्काॅप फ़िल्म थी।
गुरु दत्त की फ़िल्मों की ख़ासियत को यदि और जानें, तो उनमें उनकी ज़िंदगी के अक्स दिखाई देते हैं। उनका असंतुष्ट वैवाहिक जीवन और नाकाम मुहब्बत यह सभी वाक़िआत टुकड़ों-टुकड़ों में उनकी लोकप्रिय फ़िल्मों में आए हैं। फ़िल्म ‘साहिब, बीवी और गुलाम’ में नायक का हवेली को कर्मचारियों से गिरवा देना, उनकी असल ज़िंदगी की घटना का ही दोहराव है। उन्होंने अपने पाली हिल के ख़ूबसूरत और आलीशान बंगले को भी इसी तरह गिरवा दिया था।
यहाँ तक की गुरु दत्त कि ऑल टाइम क्लासिक फ़िल्म ‘प्यासा’ की थीम उनके पिता की संघर्षमय ज़िंदगी से प्रेरित थी। वहीं अर्ध-आत्मकथात्मक फ़िल्म ‘काग़ज़ के फूल’ में वे एक फ़िल्मकार बने थे, जिसमें उन्होंने अपनी निजी ज़िंदगी की समस्याओं को भी स्क्रिप्ट का हिस्सा बना लिया था। ‘काग़ज़ के फूल’ को ‘प्यासा’ की तरह कामयाबी नहीं मिली। जबकि आज इस फ़िल्म को सराहा जाता है, लेकिन उस वक़्त यह फ़िल्म बुरी तरह नाकाम रही थी।
इतनी नाकाम कि अपने निर्देशन पर गुरु दत्त का आत्मविश्वास भी डगमगा गया था। अलबत्ता इस फ़िल्म की फ़ोटोग्राफ़ी और कला निर्देशन की बेहद तारीफ़ हुई। अपने एक आर्टिकल ‘क्लासिक्स ऐंड कैश’ में गुरु दत्त लिखते हैं, ‘‘हमारी फार्मूला प्रधान फ़िल्मों की दुनिया में जो लीक से हटकर चलने की कोशिश करता है, उसकी उसी परिभाषा में निंदा की जाती है, जो मैथ्यू आर्नोल्ड ने शैली के लिए इस्तेमाल की थी….‘शून्य में अपने पंख पीटता फ़रिश्ता।’’’
‘काग़ज़ के फूल’ की नाकामयाबी से उबरने के एक साल बाद ही उन्होंने एम सादिक के निर्देशन में एक मुस्लिम सोशल ‘चौदहवीं का चाँद’ (1960) बनाई, जो दिलचस्प मेलोड्रामा और बेहतरीन गानों की वजह से सुपरहिट साबित हुई। ख़ास तौर पर फ़िल्म का टाइटल सॉन्ग ‘चौदहवीं का चाँद हो या आफ़ताब हो..’ बेहद लोकप्रिय हुआ। बांग्ला के बड़े उपन्यासकार बिमल मित्र के उपन्यास ‘साहिब, बीवी और गुलाम’ गुरु दत्त की एक और महत्वाकांक्षी फ़िल्म थी, जो एक बंगाली सामंती परिवार की एक दुखद कहानी थी।
भले ही फ़िल्म की क्रेडिट में इसके पटकथा लेखक अबरार अल्वी का नाम डायरेक्टर के तौर पर दिया गया था, लेकिन फ़िल्म के ज़्यादातर हिस्से का डायरेक्शन गुरु दत्त ने ही किया था। मीना कुमारी का यादगार अभिनय, शकील बदायुनी के मानीख़ेज़ गीत, हेमंत कुमार का मधुर संगीत, भानु अथैया के कास्ट्यूम्स, वीरेन नाग का कला निर्देशन और वीके मूर्ति की फ़ोटोग्राफी से इस फ़िल्म ने भारतीय सिनेमा में एक इतिहास रच दिया।
टाइम्स ऑफ इंडिया ने इस फ़िल्म की तारीफ़ करते हुए उस वक़्त लिखा था, ‘अ क्लासिक इन सेल्युलाइड’। ‘साहिब, बीवी और गुलाम’ ने सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म, सर्वश्रेष्ठ निर्देशक और सर्वश्रेष्ठ फोटोग्राफी के लिए फ़िल्मफे़यर पुरस्कार तो जीते ही, वहीं इस फ़िल्म ने राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कारों में रजत पदक और बंगाल फ़िल्म जर्नलिस्ट असोसिएशन का वर्ष की सर्वश्रेष्ठ फ़िल्म का पुरस्कार भी जीता।
यही नहीं उस साल यह फ़िल्म ऑस्कर में भारत की चौथी आधिकारिक एंट्री थी और उसमें इसे गोल्ड बियर के लिए नामांकित किया गया। ‘साहिब, बीवी और गुलाम’ 13 वें बर्लिन अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में भी दिखाई गई।
दूसरे प्रोडक्शन की बात करें, तो गुरु दत्त ने ‘बहुरानी’, ‘भरोसा’, ‘सुहागन’, ‘सौतेला भाई’, ‘12 ओ’क्लाॅक’, ‘साँझ और सवेरा’ जैसी फ़िल्मों में अदाकारी की, लेकिन उन्हें वह चर्चा नहीं मिली, जो उनके प्रोडक्शन और डायरेक्शन की फ़िल्मों को हासिल होती थी। ‘साहिब, बीवी और गुलाम’ की कामयाबी के बाद ‘मुग़ल-ए-आज़म’ के डायरेक्टर के. आसिफ़ ने उन्हें ‘लव ऐंड गाॅड’ के लिए साइन कर लिया था। फ़िल्म की शूटिंग भी शुरू हो गई थी, लेकिन गुरु दत्त की असमय मौत से यह फ़िल्म अधूरी रह गई।
बाद में उनका यह रोल संजीव कुमार ने किया। फ़िल्म ‘बहारें फिर भी आएंगी’ (1966) में गुरु दत्त ने अपने करियर का आख़िरी शाॅट दिया था, जो उनकी मौत के बाद रिलीज हुई। गुरु दत्त की कई फ़िल्में अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह में आज भी दिखाई और सराही जाती हैं। लेकिन उनकी बद-क़िस्मती देखिए अपने जीवनकाल में उन्हें न तो कोई पुरस्कार मिला और न ही फ़िल्म इंडस्ट्री में वह सम्मान मिला, जिसके वे असल हक़दार थे।
गुरु दत्त की संजीदा शख़्सियत और उनके बेमिसाल काम पर अंग्रेज़ी और हिन्दी में कई किताबें मसलन ‘गुरु दत्त : हिन्दी सिनेमा का एक कवि’ (लेखक: नसरीन मुन्नी कबीर), ‘गुरु दत्त एक अधूरी दास्तान’ (लेखक: यासिर उस्मान), ‘बिछड़े सभी बारी-बारी’ (लेखक: बिमल मित्र), ‘गुरु दत्त तीन अंकी त्रासदी’ (लेखक: अरुण खोपकर) आईं और यह सभी पाठकों को ख़ूब आकर्षित करती हैं। उनकी शख़्सियत और फ़िल्मों का जादू ही कुछ ऐसा है कि लोग उनके बारे में ज़्यादा से ज़्यादा जानना चाहते हैं।
मशहूर अदाकार और उनके जिगरी दोस्त देव आनंद ने उनके बारे में कहा था, ‘रूढ़िवाद, तय परम्परागत शैली से लड़ने के लिए उनके अंदर मौलिक और अलग होने की ज़बरदस्त महत्वाकांक्षा थी।’’
फ़िल्मों में बेहद कामयाब अदाकार और डायरेक्टर रहे गुरु दत्त की वैवाहिक ज़िंदगी बेहद तनावपूर्ण रही। अपनी पत्नी गीता दत्त से उनके सम्बन्ध अच्छे नहीं रहे। जिसका असर उनकी ज़िंदगानी पर भी पड़ा। वे अनिद्रा और अवसाद के शिकार हो गए। इन सबसे उबरने के लिए उन्होंने शराब और नींद की गोलियों का सहारा ले लिया। जिससे उनकी सेहत और बिगड़ती चली गई। सच बात तो यह है कि रील और रियल लाइफ़ में वे बैलेंस नहीं बना पाए।
एक मर्तबा ख़ुदकुशी की नाकाम कोशिश के बाद, जब उनके दोस्त ने उनसे पूछा, ‘‘…तुम ज़िंदगी से इतने असंतुष्ट क्यों हो ? ’’, तो गुरु दत्त का जवाब था, ‘‘मैं जीवन से असंतुष्ट नहीं हूँ। मैं अपने आप से असंतुष्ट हूँ। यह सच है, मेरे पास वो सब है जिसके लिए लोग तरसते हैं। फिर भी मेरे पास वो नहीं है, जो ज़्यादातर लोगों के पास है-एक कोना ऐसा हो, जहाँ पूरे दिन के काम के बाद इंसान सब कुछ भूलकर शांति के साथ बैठ सके। अगर मुझे वो मिल जाता, तो ज़िंदगी जीने लायक़ होती।’’(किताब : ‘गुरु दत्त एक अधूरी दास्तान’, लेखक: यासिर उस्मान) और यह असंतुष्टि ही उन्हें मौत की ओर खींचकर ले गई।
इस अज़ीम कलाकार-डायरेक्टर की मौत बड़े अफ़सोसनाक तरीके़ से हुई। दो बार ख़ुदकुशी की नाकाम कोशिश करने वाले गुरु दत्त 10 अक्टूबर, 1964 को उनतालीस साल की उम्र में नींद की कई गोलियाँ खा कर चिरनिद्रा में लीन हो गए। ‘काग़ज़ के फूल’ के नायक की तरह उनकी ज़िंदगी का अंत भी त्रासद ही रहा।
(ज़ाहिद ख़ान प्रगतिशील साहित्य और गंभीर सिनेमा पर नियमित लेखन करते हैं।)